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ये हाल देख के मेरा पहाड़ भी रो गया – poem by Kartik Bhatt

Pahadi Log, Migrate Image Issue

वो कभी घर हुआ करता था हमारा पर आज वो खंडहर है,
वहाँ कभी खेत हुआ करते थे हमारे पर आज वो सब बंजर है|
पलायन की आंधी ऐसी चली कि सबको अपने साथ उड़ा ले गई,
ईजा-बौज्यू ने तो कस के पकड़ा था हाथ बच्चों का पर जरूरतों ने ऐसा खींचा कि वो हाथ छुड़ा गई|
गलती भी किसकी कहें नई पीढ़ी है नई दुनियां से वास्ता तो होना चाहिए,
ज्यादा तो मांग नहीं रहे थे वो पर उनके गाँव तक पक्का रास्ता तो होना चाहिए|
ये हाल देख के मेरा पहाड़ भी रो गया,
पर क्या करें नेता तो हल्द्वानी-देहरादून जाके आराम से सो गया|

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